ढिंढोरा ,पीटते ,है ,हम ।
हक है ,समान दोनों का ।।
नर हो या हो ,कोई नारी ।
बराबर सम्मान दोनो का ।।
ये थोथी ,थोथी ,है,, बाते ।
बस है दिखावे, बस हाके ।।
जमाना आगे, आगे बढ़ रहा ।
पर सोच रुके, वहीं जाके ।।
नहीं दौर, रुका ,ज़ुल्मो का ।
आतंक ,मचा ,अपनों का ।।
एक पांव में ,जंजीर बांधी ।
दूजे को ,बक्शी ,आजादी ।।
उड़ने को, आसमा है दिया ।
रूढ़ियों की दीवार है तानी ।।
माना आज दौर है बदला,।
सोचने का तौर ,ना बदला ।।
नर तर्क ,करे तो ,सुहाता है ।
नारी उच्ची बोले, ना भाता है ।।
नारी अपना हक ,जीते तो ।
ये दुख पिछड़ों को सताता है ।।
आज दुनिया ,तवज्जू दे रही ।
दुख हीनता ,पाले अपनों का ।।
सब देवी को ,पुजा करते ।
मिट्टी को सदा मां ही कहते ।।
कथनी करनी ,को एक करो ।
सारे ग्रंथ ,यही तो, कहते ।।
दुनिया को ना ही कोसो तुम ।
ये खेल है सारा ,विचारो का ।।
नैनों में बसे ,बस प्रेम निश्चल ।
आदर करें सबका हर पल ।।
नारी है तो है आज और कल ।
इनसे ही सुनहरा है हर कल ।।
नव दौर है ,यारो ,सम हक का ।
इस पे है हक बराबर सबका ।।
इस दौर की नारी ना अबला ।
बजा देती है सबका तबला ।।
रूढ़ियों को तुम छोड़ो त्यागो ।
नारी दुर्गा का रूप ,सबला ।।
ये दौर है नारी शक्ति का ।
संग आगे ,आगे बढ़ने का ।।
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