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सुख / अतुल कनक

बारणां में खिल्याया छै घणकरा गुलाब/ राता- धौळा- पैळा एक एक डाळ पे तीन तीन कोय पे तो ईं सूँ भी बद’र....... म्हूँ खाद पटकूँ छ…

सबक / अतुल कनक

पौसाळ जाती बेटी का हाथाँ में, नतके सौंपूँ छूँ एक पुसप गुलाब को/ सिखाबो चाहूँ छूँ अष्याँ के धसूळाँ के बीचे र्है’र भी कष्याँ …

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