मुहब्बत का ज़माना आ गया है - डॉ कविता"किरण"

मुहब्बत का ज़माना आ गया है 
गुलों को मुस्कुराना आ गया है 
नयी शाखों  पे देखो आज फिर वो 
नज़र पंछी पुराना आ गया है  

जुनूं को मिल गयी है इक तसल्ली 
वफाओं का खज़ाना आ गया है 

उन्हें भी आ गया नींदे उडाना 
हमें भी दिल चुराना आ गया है 

छुपाया था जिसे हमने हमी से 
लबों पर वो फ़साना आ गया है 

नज़र से पी रहे हैं नूर उसका 
संभलकर लडखडाना आ गया है 
डॉ कविता"किरण"

मुहब्बत तो सभी करते हैं लेकिन   
हमें करके निभाना आ गया है 

हमें तो मिल गया महबूब का दर 
हमारा तो ठिकाना  आ गया है 

हम अपने आईने के रु-ब-रु हैं 
निशाने पर निशान आ गया है 

अँधेरा है घना हर और तो क्या 
"किरण"को झिलमिलाना आ गया है
                                                              -डॉ कविता"किरण"

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